Wednesday, 7 September 2016

अब मैं सोने की कोशिश नहीं करती!

अब मैं सोने की
कोशिश नहीं करती हूँ
क्यूंकि जब भी मैं
ज़रा सी भी कोशिश
करती हूँ तो कुछ देर
के लिए तो शायद
सो जाती हूँ
लेकिन फिर वही
तुम्हारी यादों के
ख्वाबों से जो
डर के उठती हूँ
तब तो बस अपने
आप को ही नहीं
सम्भाल पाती हूँ। 

संभले रहने का
ढ़ोंग करने के लिए
दिन की रौशनी
ही बहुत है
ये रातों और इनमें
बसी तन्हाई को
मैं अपना चुकी हूँ
और ये भी मुझसे दोस्ती
कर चुकी हैं।

तुम तो खैर
सो ही रहे होगे
कहीं चैन से
चादर उड़ कर
बिना किसी तक्लीफ़ के
और नहीं भी सो रहे
होगे तो सुलाने वाले
तो सुला ही देंगे। 

खैर, छोड़ो अब इन
बातों का ना कोई मोल है
ना ही कोई मायने
ये अतीत की यादें
बे बुनियादी ही होती हैं।

चिंता तो तुमको,
खैर नहीं ही होगी
लेकिन फ़िर भी
बता देती हूँ
की मैं ठीक हूँ
और बहुत जल्द
खुश होना भी सीख जाऊँगी
और नहीं भी सीखी
तो नकली मुस्कान को
अपना दोस्त तो बना
ही लूंगी।


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