Wednesday, 31 December 2014

Good Bye 2014!

Today is the last day of 2014. Another year ends with a few memories to be cherished and with some expiriences to learn from. On a personal note this year was not a very good one but on a proffessional note I got lot of opportunities to intern and learn how does this world function on a proffessional note.
On a national note this year was a landmark. Democracy reached new heights when voter turnout in kashmir was a huge 70%. BJP is almost ruling this nation now. Of course corruption and injustice have increased by many folds. Rapes, murders, suicides etc are still not treated the way they should be. The number of coffins dug on the name of religion has increased by some billion dollar times. Women empowerment has been pretty decent this year. The epic weather conditions made this year a little unhappy.
On an international note this year was a disaster. Two aeroplanes got hijacked. The goosebump giving Peshawar school attack.  The amount of blood shed in Sydney and Yemen was ridiculuosly high. Yes, one decent news was India & Pakistan sharing a nobel prize. Kailash Satyarthi & Malala setting benchmarks for human race.
With the end of 2014 all I want to end is hatred, terrorisim, wars and inequality in all forms.
In the spirit of 2015, let's prevent humanity from getting extinct, let their be love peace and harmony all around.
Wishing the world a very prosperous and a sucessful new year.

Bye Bye 2014!
Cheers!!!!! :D

Tuesday, 30 December 2014

Dearest darling DU Result!

Dearest darling DU Result!
The nation is waiting for you and so am I. Fans who love you more than other people have been sending blank links of the same day in and day out.
The world would be grateful to you if you could give us a fixed, non-flexible appointment so that we can make the required arrangements to welcome you.
Most importantly please arrive on the date and time you have fixed.


Monday, 29 December 2014


those innocent smiles
living a serene life

the wrinkle less forehead
with which they hit the bed

those chubby cheeks
that always tweet

the lovely aura
that blends with flaura

the little tears
that mingle with fears

those naughty eyes
which look for flight

Such is life
Live it before it dies!!! :D :)

Sunday, 28 December 2014

Dear Winters!

Dear Winters,
I know you love the capital city. But please realise that excess of anything is harmful, as a result you should also control/reduce the amount of love you've been showering on us.
If possible see us in June.
Waiting eagerly for your response.
Human Unit.

Saturday, 27 December 2014

Folk Music!

Though the concept of folk music is a bit endangered today, it is still the best form to reach the masses. This variety of music is not based on any technical or practical knowledge of music yet is the most satisfactory form of music. People share their bit of sadness, happiness and probably many other feelings which I don’t know. These songs are usually sung in regional languages or dialects. Accompanying instruments are usually local instruments, utensils that are often converted into instruments and the best accompaniment is the claps of people who sing along. The beauty of folk music is not publicised the way it should be, maybe because it is not meant to make money, it is just meant to make people sit together and share.
If not implement folk music let's adopt it's spirit that is sit, share and live life.

Sing. Relax and Smile!!! :) :D

Thursday, 25 December 2014


कुछ रातें ऐसी होती हैं जब मुझे नींद नहीं आती, एक अजीब सी बेचैनी होती है. लगता है कुछ फसा हुआ है दिल और दिमाग मे, कुछ ऐसा जो मैं शब्दों मैं बयां नहीं कर सकती, बस महसूस कर सकती हूँ. ये बैचैनी किसी एक विषय तक सीमित नहीं होती. कभी देश की चिंता, कभी मानवता की मृत्यु का डर, कभी अपने भविष्य को ले कर विचार और भी न जाने क्या क्या समस्याओं के बारे मैं विचार करके बैचैन होती रहती हूँ मैं.
क्या कारण है इस बैचैनी का मुझे नहीं मालूम, पर इतना ज़रूर जानती हूँ की इस बैचैनी ने मेरी जिज्ञासा को बढ़ावा दिया है, और ये अच्छी बात है. जब ये घुटन भरी बैचैनी सब्र की सीमा को पार कर जाती है तब मैं गाने गाती हूँ एक ही पंक्ति को बार बार गाती हूँ ताकि मेरा ध्यान भटक जाए और मैं थोडा बेहतर महसूस करूँ. फैज़ अहमद फैज़ के गाने सुन कर भी बैचैनी नाम के दानव से मुक्ति पायी जा सकती है.
बस और क्या कहूँ बैचैनी के बारे मैं? बेचैनी बुरी तो है ही पर शायद थोड़ी ज़रूरी भी है!

Wednesday, 24 December 2014

कुछ सवाल!

अरे आखिर कहा है वो विद्यालय जहाँ मानव को मानवता का पाठ पढाया जाए?
 कौनसी जगह है वो जहाँ पर मज़हब के नाम पर खून ना बहे.?
कोनसा है वो गुरु जो ये बताये की एक ही है वो चाहे अल्लाह कहो या राम?
 कहाँ है वो स्थान जहाँ उंच नीच का भेद भाव ना हो?
कौन है जो नफरत मिटा सकता है?
आखिर और कितनी लाशें सजेंगी धर्म के नाम पर?
और कितने लोग मरेंगे अंकों की आड़ मैं?
 आखिर कहाँ है कहाँ इन सवालों का जवाब?
जवाब है भी इन सवालों का या नहीं?
या हम इस जालिमियत के आदि हो जाएँ?

Monday, 22 December 2014

Sunday, 21 December 2014


The world is not a very pleasant place now, well......this sounds a bit pesimistic so I'll rephrase it, world is not a very happy place. Today people believe in capturing moments rather than living them and earning has become more important than learning. Life has become a robotic schedule now. Seems lives are being programmed to get the best results. You study, earn and die. A simple yet rotten schedule that human units follow. Out of all the mess capitalisim has created, the level of disgust education system has induced their is still something which keeps me going and that is the SKY above.
This may sound a bit wierd, but I find the sky really very serene and peaceful. I dont know what attracts me towards it but whenever I am stressed or a bit nervous I just look at the sky above and I can feel something soothing. The blue beauty above has a mesmirising charm. The sun shines and the moon smiles. The stars twinkle and the clouds mingle with the gorgeousness of the sky.
I have asked myself a couple of times that what is their in the sky which makes me smile, the only reply my heart gave was "It gives you a reason to smile, so stop questioning for a change, stare the sky and keep smiling". Well, this is a legitimate reason, the world is as it is reducing reasons to smile so if sky is giving me a reason to smile, so why should I let it go?
 I thought I had brains which usually answered my questions but off late I realised my heart was wiser than my mind. Maybe, that is why people always say that listen to your heart and you shall never go wrong in life.
Hence, from now on after a tiring day just look at the sky for two minutes with a chocolate for best results and you shall realise what calmness is!!!!!!!! :D

Look, Believe, Smile!!! :) :D

Friday, 19 December 2014

मासूमियत: एक गुनाह?

कल सुबह की ही तो बात थी फरहान और आमिर अपनी अम्मी की डांट खा कर उठे, फिर आधी नींद मे स्कूल के लिए तैयार हुए, दुआ करी, नाश्ते मैं अम्मी के बनाये हुए लज़ीज़ पराठे खाए, अब्बू से रिकक्षा के लिए पैसे लिए, बस्ता उठाया और दोनों भाई एक दुसरे के कंधे पर हाथ रख कर  जोर से खुदा हाफिस बोल कर घर से निकल गए. रास्ते मैं फरहान ने अपने छोटे भाई आमिर के लिए बशीर चाचा की दूकान से मिठाई ली, और फरहान ने खूब चटकारे ले कर चलते चलते मिठाई खायी. हस्ते, खेलते, मुस्कुराते दोनों भाई स्कूल पहुँच गए.  वैसे तो आमिर १२ साल का था और अपने आप अपनी कक्षा में जाने के काबिल भी था पर फरहान को उससे उसकी कक्षा मे छोड़े बिना चैन नहीं आता था.
पूरा स्कूल दोनों भाई के बीच की मोहोबत की मिसालें देता था. आमिर के लिए उसके भाई जान से बड़ा कोई हीरो नहीं था, उसके भाई जान उसके सबसे अच्छे दोस्त, भाई, और ज़रुरत पड़ने पर अम्मी का किरदार भी बखूबी निभा लेते.  आमिर के लिए उसके भाई जान खुदा से भी बढ़कर हैं और हमेशा रहेंगे. वो बस अपने भाई जान को आवाज़ लगाता और उसकी पुकार सुनते ही फरहान अपना ज़रूरी से ज़रूरी काम छोड़ कर भाई के पास दौड़ा चला जाता. फरहान की अगर कभी तबियत खराब होती तो आमिर अपने भाई जान के सिरहाने से एक पल के लिए भी दूर नहीं होता. उनको दवाई भी वो खुद ही पिलाता, खाना भूक न लगने पर भी भाई जान खा लो ना कह कह कर खिलाता, दोनों भाई स्कूल मैं भी खाना एक दुसरे के साथ ही खाते थे.  और मजाल थी किसी की फरहान के रहते आमिर को कोई कुछ कह दे.
कल भी एक आम दिन ही था. ब्रेक की घंटी बजते ही फरहान अपने छोटे भाई आमिर के पास पहुंचा और दोनों भाइयों ने मिलकर खाना खाया, पानी पिया, और फिर वापिस अपनी अपनी कक्षा मे चले गए. तकरीबन एक घंटे बाद पूरे स्कूल मे गोलियों की आवाज़ आ रही थी, आमिर भाग कर अपने भाई जान की कक्षा मे गया और फरहान को कस कर गले लगा लिया, फरहान ने बोला पगले मैं हूँ ना आपके पास मत डरो, आमिर बस अपने भाई जान से चिपका ही रहा. कुछ देर बाद फरहान की नज़र कुछ आदमियों पर पड़ी जो बन्दुक ले कर उसी कमरे मे आ रहे थे जहाँ पर वो दोनों थे. फरहान ने जल्दी से अपनी पीठ दरवाज़े की ओर करी और आमिर खूब ज़रूर से अपने गले लगा लिया, जैसे की लगे की सिर्फ एक ही इंसान है उस कमरे मे. दो मिनट बाद उन ज़ालिम बंदूक वाले आदमियों ने फरहान की पीठ पर गोलियां चला दी.
लेकिन फरहान ने अपनी आखरी सांस तक अपने भाई को अपने सीने से लगाये रखा, बस उसकी आँखें बंद ही होने वाली थी उसका शरीर खून से सना हुआ था, तभी उसने अपने भाई को खिड़की ओर इशारा करके कहा की उस रास्ते से भाग जाओ. आमिर फिर भी हाथ नहीं छोड़ रहा था, फरहान ने आमिर के हाथ को चूमा ओर फिर उसकी आँखें बंद हो गयी. आमिर की आँखों से सिर्फ आंसू बह रहे थे, मुह से एक आवाज़ भी नहीं निकली उस मासूम के मूह से. 8 घंटे तक वो बस अपने भाई का हाथ पकडे उसकी लाश को देखता रहा. फिर जब सब शांत हुआ तब कुछ सनिकों ने आमिर को गोद मे  और फरहान  को कब्र मे बंद कर के बहार ले जाया गया. अम्मी ने आमिर को देख कर उससे अपने सीने से लगाया और फूट फूट कर रोने लगी, दो पल बाद ही फरहान की कब्र आ गयी. अम्मी अपनी औलाद की कफ़न देख कर बेहोश हो गयी, बड़ी मुश्किल से उन्हें होश मे लाया गया, फिर अब्बा और आमिर ने फरहान की कब्र को कन्धा दिया और कब्रिस्तान की ओर चल दिए. आमिर के मुह से अभी तक एक आवाज़ भी नहीं निकली, मानो जिंदा लाश बन गया था वो.
आज पूरे 48 घंटे हो गए हैं आमिर के गले से एक बूँद पानी तक नीचे नहीं गया है, अभी तक एक आवाज़ नहीं निकली है. अम्मी का रो रो कर  बुरा हाल है, अब्बा ने कुछ हिम्मत जुटा रखी है पता नहीं कैसे. शायद ये सोच कर की वो टूट गए तो बाकी लोगों को कोन संभालेगा.
अब तो बस एक ही सवाल है: क्या मासूमियत एक गुनाह है?
उफ़! पता नहीं क्या हो रहा है ये. पता नहीं कब रुकेगा ये, कभी कभी तो ये भी लगता है की रुकेगा भी या नहीं यूँ
मज़हब के नाम पे मासूमों की जान लेना? क्या अब  कोई धर्म इंसानियत से भी ज्यादा बड़ा  हो गया है?
ना जाने और कितनी कब्र  खुदेंगी अब?
ना जाने कितने घरों की ईद और दिवाली पे ग्रहण लगेगा?
ना जाने और क्या क्या होगा!!!!
इंसानियत तुम्हारी बड़ी याद आ रही है आजकल!!!!! :(

Wednesday, 17 December 2014

Humanity: A myth?

It seems that something is wrong with 16th December.  In 2012 it was the brutal gang rape and in 2014 it was the horrific attack in a school in Peshawar. Of course! the date is not to be blamed, it is the dying spirit of humanity that leads to such incidents.
As per various reports 132 children were shot dead and more than 400 student got injured. Sources reveal that this happened in the name of RELIGION. I am quite sure Allah wont be happy seeing those small coffins.  I don't really understand which holy book teaches terrorisim. I was taught to love human race  in school but as I grew up I was unfortunately exposed to all the complications this world had and still has. Honour killings, rape, murders have become normal incidents now. They aren't even the part of the front page of our newspapers. But this does not mean that these things dont exisit. Some people in order to condemn the deeds done by terrorists, rapists etc, compare them with animals. But what i strongly believe is animals are much better than these human beings. Comparing such inhuman human beings with innocent animals is an insult to the animal kingdom. Has anyone ever heard animals fight over religion? have you ever heard of rape cases in animal kingdom? NO! and that is the reason why today animals are more sophisticated and cultured as compared to human beings.
My faith on humanity is shaking or rather trembeling maybe because i know humanity will soon be a myth!


Tuesday, 16 December 2014

Dance: A Crime?

I was at an event in Siri fort auditorium. One of my closest friend was the lead Bharatnatyam dancer in the event and trust me she danced really well. But after the event something really very shocking happened her mother came to the green room where we both were chatting and slapped her. She said " ye sab kya kaand kiya hai tumne", at that point only her dance teacher came and said " madam kya kar rahi hain, isne to jaan daaldi aaj" her mother didn't say anything and held her hand and went away.
Well, I am not shocked with this incident at all, just so use to this crap. I only have one doubt since when did dancing become a KAAND?
Huh! Indian parents and education system are just beyond me. World you are officially hopeless. Absolutely hopeless. 

Monday, 15 December 2014


हर वो चीज़ जो दिल से निकले, हर वो चीज़ जिससे करे बिना हाथ तडपे, हर वो चीज़ जो सुकून दे होती है कला. खैर आजकल तो पैसे में हर चीज़ तोली जाती है आखिर हम एक प्रगतिशील दुनिया का जो हिस्सा हैं, लेकिन अगर कोई भला इंसान इन लोगों को ये समझा दे की कला को इनके पैसों की कभी ज़रुरत नहीं होती, कला को तो इन लोगों तक की ज़रुरत नहीं है, ये तो यही बेबस लोग है जो ज़माने की भागदौड़ से थक हारकर के कला की ओर खिचे चले आते हैं.
थक हार के जब वापस आते हैं घर तो किशोरे दा के गाने सुने की तलब लगती है ना? मन करता है लेकिन स्वीकार करना भी तो शान के खिलाफ है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब कह कह कर हार गए " ज़माने की दौड़ मैं इतना न खो जाओ की आत्मा को सुकून देने वाले संगीत का भी ख्याल न हो" .
लोग इतने व्यस्त होगये हैं अब की नृत्य और नाच मे फरक तक भूल गए हैं. नृत्य वो होता है जिसमे ताल की मात्राओं और थाप की लय का ख्याल रखा जाता है, और नाच वो होता है जो बस शारीर को ख़ुशी से हिलाने पर किया जाता है. पते की बात इसमें ये है की ये दोनों चीज़ें एक हो कर भी कितनी अलग है, और इन दोनों की ही अपनी एहमियत है. और ये दोनों ही कला हैं.
मैं शायद अपने विचार कला के प्रति कभी भी शब्दों मे अभिव्यक्त ना कर पाऊं  क्यूंकि मेरे लिए 
कला इश्क है कला सांसों का वजूद है कला जीने का मकसद है!!!!!!

Sunday, 14 December 2014


इंसान अक्सर दिमाग को शांत करने के लिए नशा करता है. पर फिर भी लोग कहते हैं नशा नाश करता है. शायद  करता हो भी. मुझे इस विषय मैं अधिक जानकारी नहीं है. या फिर यु समझ लीजिये की अभी इस पर अपनी टिपण्णी देने योग्य नहीं हुई हूँ.
हो सकता है बिड्डी, शराब इन चीज़ों का नशा बुरा हो. पर मुझे इनका नशा करने की आदत नहीं है. मुझे तो सुर,ताल,रंगो और मुस्कानों का नशा है. ये एक ऐसा नशा है जिससे दिमाग शांत और मन को को सुकून मिलता है. एक अजीब सी शांति का आभास होता है. चंद पलों के लिए ही सही, दुनिया बहुत ही खूबसूरत लगती है. ऐसा लगता है हर पल कितना प्यारा है.
अब आप ही बताये जो आजकल के ज़ालिम ज़माने मैं मई हृदय को सुकून और चैन की एहसास दिलाये उससे छोड़ना उचित होगा क्या? नहीं ना! इसीलिए नाचिये, गाइए, रंगों के सोंदर्य मई खोइए मुस्कुराइए और लोगो के मुस्कुराने की वजह बनिये.
क्या पता इस बहाने आप ज़िन्दगी से रुबरो हो जाएँ!!! :) :D

Saturday, 13 December 2014

ज़िन्दगी तो बस हौंसलों की उड़ान है!

ज़िन्दगी तो बस हौंसलों की उड़ान है
सपनों पर गुमान है
अपनी बनानी पहचान है
जज्बातों पर अभिमान है
अपनों की बढानी शान है
दोस्तों में बसी जान है
वक़्त बड़ा शैतान है
और ये सब मिलकर बने ज़माने का स्वाभिमान हैं!!!!!

Friday, 12 December 2014

Reservations: yes OR no?

Reservation in India is the process of setting aside a certain percentage of seats (vacancies) in government institutions for members of backward and under-represented communities (defined primarily by caste and tribe). Reservation is a form of quota-based affirmative action. It is governed by constitutional laws, statutory laws, and local rules and regulations. Scheduled Castes (SC), Scheduled Tribes (ST) and Other Backward Classes (OBC) are the primary beneficiaries of the reservation policies under the Constitution- with the object of ensuring a "level" playing field.s
I am not really very against this concept but it's missuse disturbs me a lot. These days i believe reservation is given priority over merit and this ABSOLUTELY UNFAIR. Reservation to an extent is alright but beyond that it becomes harmful in both ways sociallly and economically. A particular sect of our society has stopped working just because they know that their is something called reservation which is going to save them no matter what, while the other half of the society works day in and day out even after knowing the fact that may or may not get an opportunity to even show that they are capable of something.
I think or rather firmly believe that it's time to ammend this provision. If not scrap this policy we must reduce the percentage of it for sure. Otherwise, merit shall soon die.

Think, Speak, Act!!! :D :)

Thursday, 11 December 2014


 दुनिया  के बुरे दिन तो तब से चले आ रहे हैं जब से एक भाई दूसरे भाई का क़त्ल  सिर्फ कुछ करोड़ रुपयों क लिए कर रहा है, लोग 5 साल की मासूम बच्चियों के बलात्कार कर रहे हैं, बुज़र्गों को कुत्तों से बदतर तरीके की ज़िन्दगी गुज़ारने पर विवश किया जा रहा है और न जाने क्या क्या होता चला आ  रहा है इस प्रगतिशील संसार मैं.  मुझे लगता था की ये बुराई  की चरम सीमा होगी लेकिन मैं गलत थी.
लोग तो अब धर्म के नाम पे भी युद्ध करते हैं. मंदिर मस्जिद बनाने के चक्कर मैं ही न जाने कितनी हज़ार जाने चली जाती हैं, न जाने कितने बच्चे अनाथ हो जाते हैं, न जाने कितने लोगों और परिवारों की खुशियों पर ग्रहण लग जाता है. वैसे तो मैं अपने आप को नास्तिक मानती हूँ लेकिन इतनी तो समझ मुझे भी है की अल्लाह ओर राम अलग नहीं हैं. माँ हो या अम्मी, पापा हो या अब्बा, दीदी हो या आपी, मौसी हो या खाला होता तो सब एक ही है.  हम गुलज़ार और  बच्चन दोनों की कवितायेँ पढ़ते हैं, रफ़ी साहब और किशोर दा के गाने सुनते हैं, और तो और हलवा हो या सिवयीं दोनों ही चाव से खाते हैं तो भला हिन्दू मुसलमान मैं फर्क क्यूँ करें?
ईद हो या दिवाली मकसद तो सिर्फ लोगों को जोड़ना ही होता है, प्रार्थना हो या दुआ की तो दोनो ही अपने और अपनों की भलाई के लिए जाती है, तो फिर आखिर क्या फर्क पड़ता है की मेरा नाम शर्मा हो या खान?
अर्थी उठे या कब्र खुदे, शोक मने या दुःख हो, अश्क बहे या आंसू, दर्द हो या पीड़ा क्या अब  इनमें भी कोई फरक होता है?
अरे भले लोगों! चाहे सुख की घडी हो या दुखों का बादल छा गया, मुसीबत और समस्या भी इतना भेद भाव नहीं करती जितना हम लोगों ने आपस मैं करना शुरू कर दिया है.
चाहे कोई भी धर्म हो पढ़ाती तो इंसानियत और मानवता का पाठ ही है.
प्यार और मोहोबत दोनों ही बाटने से बढती है दोस्तों! :D

Wednesday, 10 December 2014


जो लोग कहते हैं आजकल भलाई का ज़माना नहीं है.  वो लोग उस प्रजाति के होते हैं जिन्होंने शायद काफी समय से दर्पण नहीं देखा होता है. अब आप सोचते होंगे की मैं भला ऐसा क्यूँ कह रही हूँ. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि भलाई कोई मिठाई तो है नहीं जो खाने से ये या बाटने से कम हो जाये, तो फिर ये भली भलाई आखिर कम या ख़तम आखिर हो कैसे रही है?
मैंने काफी दिनों तक इस विषय पर विचार किया फिर कहीं जा कर ये समझ आया की भलाई नहीं भले लोगों का अकाल पड़ गया है इस दुनिया मैं. आजकल लोग रूपया, पैसा, घर, गाडी, बंगला, जयादात को एकत्रित करने मैं इतने व्यस्त हो गए हैं की अपने अपनों के लिए ही समय नहीं निकाल प् रहे हैं, औरों की तो कोई क्या ही बात करे. बड़ा अफ़सोस हुआ मुझे ये जान कर की आजकल दोस्ती-यारी तो मानो बोझ ही बन गयी है हम लोगों पर.
कल-परसों एक बुज़ुर्ग आदमी से मेरी बस युहीं राह चलते बात हो रही थी, बातों ही बातों मैं उन्हों ने कहा " अर्थी को कन्धा देने ये दौलत नहीं बल्कि चार आदमी ही आयेंगे" ये बात सुनकर मेरे मानो कान ही खड़े हो गए, पर दो पल बाद जब मैंने ये बात सोची तो मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत  हो गयी.
काश ये दुनिया पैसे के आगे कुछ सोच पाती तो वाकई बहुत खूबसूरत होती, तब शायद इस भलाई की इतनी कमी भी महसूस ना होती
लेकिन फिर भी उम्मीद पे दुनिया कायम है, तो फिर भलाई को मारा हुआ घूषित करना भी उचित नहीं होगा, इसलिए अगर  हो सके तो कभी अमीर इंसान बनने की दौड़ से फुर्सत मिलने  पर एक बार दर्पण ज़रूर देख लिजियेगा अपने अन्दर की भलाई से ज़रूर वाकिफ हो जायेंगे!

Tuesday, 9 December 2014


100 people killed in Gaza, few rapes in Delhi, some scams of 1000 crores, woman killed for dowry, girls below 5 years of age are raped because apparently they were wearing inappropriate clothes (i.e. frocks), homosexuals harassed everyday, USA doing almost anything and everything to make this world a capitalist economy and the list can go and on.
Law and order, police, international organisations etc. Ah! i think these are absolutely dead or rather absolutely in active or whatever it is.
Am i getting used to all this??
NO NO NO! I just cannot/ should not be OKAY with all this. I should go mad/sleepless/ at least i should get affected as I used to get earlier.


Sunday, 7 December 2014

Thank You! :D

In the past 48 hours I have recieved two formal awards and a book with a note and an autograph which was gifted by a very special professor in college. Somehow I am happier because of that book of exactly 229 pages [including preface, acknowledgements etc] more than those awards.
At times doing things that you really love to do and you know that you have that one person who likes what you love doing is much more satisfying working for medals, CV and certificates!

Passion, Work, Life!!! :D :)

Saturday, 6 December 2014

छोटी सी ज़िन्दगी!

लोग कहते हैं ज़िन्दगी बड़ी लम्बी और हसीन होती है, पर मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है की ज़िन्दगी बहुत छोटी होती है.
हाँ! छोटी.
बहुत छोटी है
 इसीलिए अश्क बहा कर इसे व्यर्थ न करें मुस्करिये और दूसरों के मुस्कुराने की वजह बनिए
इसीलिए हर उस चीज़ का तजुर्बा कीजिये जिसका आप करना चाहते हैं, क्यूंकि क्या पता कल हो न हो
इसीलिए लोगों मैं इतना प्यार बाटीये की हर पल, हर सांस उन्हें अपनेपन का एहसास हो
इसलिए खूब  सारे खूबसूरत सपने देखिये और उन्हें पूरा करने का आनंद उठाइए
इसीलिए बंदिश की घुटन से बहार आ कर आज़ादी की हवा में सांस लीजिये
सच मैं ज़िदगी बहुत ही छोटी है शोक मनाने के लिए इसलिए जी लीजिये अपनी छोटी सी ज़िन्दगी!

Friday, 5 December 2014

Dilemma! :p

Supposedly the Earth rotates around the sun. But the sun is also flying a 100 million miles per hour through the Milky way galaxy. But wait the Milky way galaxy is also rotating around a single universe. And then THAT universe is also rotating with other universes.
And with so many rotations happening around me people expect me to stand still. How is that even possible???

Confused, Confused, Confused!!!!!

Wednesday, 3 December 2014

Life: A Canvas!

They say life is a journey, well I say life is a canvas. A blank canvas and nothing else. I don't know why but these days I have started seeing colours as the most innocent form of expression. I don't even know whether this is a good thing or a bad thing. At times I think this because people have become so busy that sitting together seems to be a burden on them.
Whereas colours on the other hand just aptly depict every emotion and feeling. 
So, yes. Paint this canvas called LIFE very beautifully. The best part of painting this canvas is that you don't need to be an artist, you don't have to use complicated techniques for painting this gorgeous master piece. All one needs is a base of love and hugs,a pinch of optimism, a handful of friends, sacks full of dreams and most importantly truck loads of courage to live life! 

Paint, live, dream!!! :D

Tuesday, 2 December 2014


I am not a language student technically,  but I love exploring new languages everyday.  I feel languages themselves have their own sweet world. Each language has it's own beauty. For example: punjabi automatically creates a very lively mood whereas Urdu is a very composed language very soft and mild language.  Each language has it's own beauty and nature.
But what I feel these days is accent is given more importance than the actual language. For some it is a status symbol, like speaking Hindi or any other language in British or American accent seems to be the new cool. One must realise every language or for that matter even dialects have their own identity. Love the language the way it is because nobody enjoys when someone fiddles with their identity.
The moment you think or start believing in the identity and the fragrance of every language you will be exposed to a whole new world. Where the only aim is to keep the spirit and the love for word alive. That moment will be one of the finest moment you will ever experience.

Live,  love and read! :D