Wednesday, 31 December 2014

Good Bye 2014!

Today is the last day of 2014. Another year ends with a few memories to be cherished and with some expiriences to learn from. On a personal note this year was not a very good one but on a proffessional note I got lot of opportunities to intern and learn how does this world function on a proffessional note.
On a national note this year was a landmark. Democracy reached new heights when voter turnout in kashmir was a huge 70%. BJP is almost ruling this nation now. Of course corruption and injustice have increased by many folds. Rapes, murders, suicides etc are still not treated the way they should be. The number of coffins dug on the name of religion has increased by some billion dollar times. Women empowerment has been pretty decent this year. The epic weather conditions made this year a little unhappy.
On an international note this year was a disaster. Two aeroplanes got hijacked. The goosebump giving Peshawar school attack.  The amount of blood shed in Sydney and Yemen was ridiculuosly high. Yes, one decent news was India & Pakistan sharing a nobel prize. Kailash Satyarthi & Malala setting benchmarks for human race.
With the end of 2014 all I want to end is hatred, terrorisim, wars and inequality in all forms.
In the spirit of 2015, let's prevent humanity from getting extinct, let their be love peace and harmony all around.
Wishing the world a very prosperous and a sucessful new year.

Bye Bye 2014!
Cheers!!!!! :D

Tuesday, 30 December 2014

Dearest darling DU Result!

Dearest darling DU Result!
The nation is waiting for you and so am I. Fans who love you more than other people have been sending blank links of the same day in and day out.
The world would be grateful to you if you could give us a fixed, non-flexible appointment so that we can make the required arrangements to welcome you.
Most importantly please arrive on the date and time you have fixed.


Monday, 29 December 2014


those innocent smiles
living a serene life

the wrinkle less forehead
with which they hit the bed

those chubby cheeks
that always tweet

the lovely aura
that blends with flaura

the little tears
that mingle with fears

those naughty eyes
which look for flight

Such is life
Live it before it dies!!! :D :)

Sunday, 28 December 2014

Dear Winters!

Dear Winters,
I know you love the capital city. But please realise that excess of anything is harmful, as a result you should also control/reduce the amount of love you've been showering on us.
If possible see us in June.
Waiting eagerly for your response.
Human Unit.

Saturday, 27 December 2014

Folk Music!

Though the concept of folk music is a bit endangered today, it is still the best form to reach the masses. This variety of music is not based on any technical or practical knowledge of music yet is the most satisfactory form of music. People share their bit of sadness, happiness and probably many other feelings which I don’t know. These songs are usually sung in regional languages or dialects. Accompanying instruments are usually local instruments, utensils that are often converted into instruments and the best accompaniment is the claps of people who sing along. The beauty of folk music is not publicised the way it should be, maybe because it is not meant to make money, it is just meant to make people sit together and share.
If not implement folk music let's adopt it's spirit that is sit, share and live life.

Sing. Relax and Smile!!! :) :D

Thursday, 25 December 2014


कुछ रातें ऐसी होती हैं जब मुझे नींद नहीं आती, एक अजीब सी बेचैनी होती है. लगता है कुछ फसा हुआ है दिल और दिमाग मे, कुछ ऐसा जो मैं शब्दों मैं बयां नहीं कर सकती, बस महसूस कर सकती हूँ. ये बैचैनी किसी एक विषय तक सीमित नहीं होती. कभी देश की चिंता, कभी मानवता की मृत्यु का डर, कभी अपने भविष्य को ले कर विचार और भी न जाने क्या क्या समस्याओं के बारे मैं विचार करके बैचैन होती रहती हूँ मैं.
क्या कारण है इस बैचैनी का मुझे नहीं मालूम, पर इतना ज़रूर जानती हूँ की इस बैचैनी ने मेरी जिज्ञासा को बढ़ावा दिया है, और ये अच्छी बात है. जब ये घुटन भरी बैचैनी सब्र की सीमा को पार कर जाती है तब मैं गाने गाती हूँ एक ही पंक्ति को बार बार गाती हूँ ताकि मेरा ध्यान भटक जाए और मैं थोडा बेहतर महसूस करूँ. फैज़ अहमद फैज़ के गाने सुन कर भी बैचैनी नाम के दानव से मुक्ति पायी जा सकती है.
बस और क्या कहूँ बैचैनी के बारे मैं? बेचैनी बुरी तो है ही पर शायद थोड़ी ज़रूरी भी है!

Wednesday, 24 December 2014

कुछ सवाल!

अरे आखिर कहा है वो विद्यालय जहाँ मानव को मानवता का पाठ पढाया जाए?
 कौनसी जगह है वो जहाँ पर मज़हब के नाम पर खून ना बहे.?
कोनसा है वो गुरु जो ये बताये की एक ही है वो चाहे अल्लाह कहो या राम?
 कहाँ है वो स्थान जहाँ उंच नीच का भेद भाव ना हो?
कौन है जो नफरत मिटा सकता है?
आखिर और कितनी लाशें सजेंगी धर्म के नाम पर?
और कितने लोग मरेंगे अंकों की आड़ मैं?
 आखिर कहाँ है कहाँ इन सवालों का जवाब?
जवाब है भी इन सवालों का या नहीं?
या हम इस जालिमियत के आदि हो जाएँ?

Monday, 22 December 2014

Sunday, 21 December 2014


The world is not a very pleasant place now, well......this sounds a bit pesimistic so I'll rephrase it, world is not a very happy place. Today people believe in capturing moments rather than living them and earning has become more important than learning. Life has become a robotic schedule now. Seems lives are being programmed to get the best results. You study, earn and die. A simple yet rotten schedule that human units follow. Out of all the mess capitalisim has created, the level of disgust education system has induced their is still something which keeps me going and that is the SKY above.
This may sound a bit wierd, but I find the sky really very serene and peaceful. I dont know what attracts me towards it but whenever I am stressed or a bit nervous I just look at the sky above and I can feel something soothing. The blue beauty above has a mesmirising charm. The sun shines and the moon smiles. The stars twinkle and the clouds mingle with the gorgeousness of the sky.
I have asked myself a couple of times that what is their in the sky which makes me smile, the only reply my heart gave was "It gives you a reason to smile, so stop questioning for a change, stare the sky and keep smiling". Well, this is a legitimate reason, the world is as it is reducing reasons to smile so if sky is giving me a reason to smile, so why should I let it go?
 I thought I had brains which usually answered my questions but off late I realised my heart was wiser than my mind. Maybe, that is why people always say that listen to your heart and you shall never go wrong in life.
Hence, from now on after a tiring day just look at the sky for two minutes with a chocolate for best results and you shall realise what calmness is!!!!!!!! :D

Look, Believe, Smile!!! :) :D

Friday, 19 December 2014

मासूमियत: एक गुनाह?

कल सुबह की ही तो बात थी फरहान और आमिर अपनी अम्मी की डांट खा कर उठे, फिर आधी नींद मे स्कूल के लिए तैयार हुए, दुआ करी, नाश्ते मैं अम्मी के बनाये हुए लज़ीज़ पराठे खाए, अब्बू से रिकक्षा के लिए पैसे लिए, बस्ता उठाया और दोनों भाई एक दुसरे के कंधे पर हाथ रख कर  जोर से खुदा हाफिस बोल कर घर से निकल गए. रास्ते मैं फरहान ने अपने छोटे भाई आमिर के लिए बशीर चाचा की दूकान से मिठाई ली, और फरहान ने खूब चटकारे ले कर चलते चलते मिठाई खायी. हस्ते, खेलते, मुस्कुराते दोनों भाई स्कूल पहुँच गए.  वैसे तो आमिर १२ साल का था और अपने आप अपनी कक्षा में जाने के काबिल भी था पर फरहान को उससे उसकी कक्षा मे छोड़े बिना चैन नहीं आता था.
पूरा स्कूल दोनों भाई के बीच की मोहोबत की मिसालें देता था. आमिर के लिए उसके भाई जान से बड़ा कोई हीरो नहीं था, उसके भाई जान उसके सबसे अच्छे दोस्त, भाई, और ज़रुरत पड़ने पर अम्मी का किरदार भी बखूबी निभा लेते.  आमिर के लिए उसके भाई जान खुदा से भी बढ़कर हैं और हमेशा रहेंगे. वो बस अपने भाई जान को आवाज़ लगाता और उसकी पुकार सुनते ही फरहान अपना ज़रूरी से ज़रूरी काम छोड़ कर भाई के पास दौड़ा चला जाता. फरहान की अगर कभी तबियत खराब होती तो आमिर अपने भाई जान के सिरहाने से एक पल के लिए भी दूर नहीं होता. उनको दवाई भी वो खुद ही पिलाता, खाना भूक न लगने पर भी भाई जान खा लो ना कह कह कर खिलाता, दोनों भाई स्कूल मैं भी खाना एक दुसरे के साथ ही खाते थे.  और मजाल थी किसी की फरहान के रहते आमिर को कोई कुछ कह दे.
कल भी एक आम दिन ही था. ब्रेक की घंटी बजते ही फरहान अपने छोटे भाई आमिर के पास पहुंचा और दोनों भाइयों ने मिलकर खाना खाया, पानी पिया, और फिर वापिस अपनी अपनी कक्षा मे चले गए. तकरीबन एक घंटे बाद पूरे स्कूल मे गोलियों की आवाज़ आ रही थी, आमिर भाग कर अपने भाई जान की कक्षा मे गया और फरहान को कस कर गले लगा लिया, फरहान ने बोला पगले मैं हूँ ना आपके पास मत डरो, आमिर बस अपने भाई जान से चिपका ही रहा. कुछ देर बाद फरहान की नज़र कुछ आदमियों पर पड़ी जो बन्दुक ले कर उसी कमरे मे आ रहे थे जहाँ पर वो दोनों थे. फरहान ने जल्दी से अपनी पीठ दरवाज़े की ओर करी और आमिर खूब ज़रूर से अपने गले लगा लिया, जैसे की लगे की सिर्फ एक ही इंसान है उस कमरे मे. दो मिनट बाद उन ज़ालिम बंदूक वाले आदमियों ने फरहान की पीठ पर गोलियां चला दी.
लेकिन फरहान ने अपनी आखरी सांस तक अपने भाई को अपने सीने से लगाये रखा, बस उसकी आँखें बंद ही होने वाली थी उसका शरीर खून से सना हुआ था, तभी उसने अपने भाई को खिड़की ओर इशारा करके कहा की उस रास्ते से भाग जाओ. आमिर फिर भी हाथ नहीं छोड़ रहा था, फरहान ने आमिर के हाथ को चूमा ओर फिर उसकी आँखें बंद हो गयी. आमिर की आँखों से सिर्फ आंसू बह रहे थे, मुह से एक आवाज़ भी नहीं निकली उस मासूम के मूह से. 8 घंटे तक वो बस अपने भाई का हाथ पकडे उसकी लाश को देखता रहा. फिर जब सब शांत हुआ तब कुछ सनिकों ने आमिर को गोद मे  और फरहान  को कब्र मे बंद कर के बहार ले जाया गया. अम्मी ने आमिर को देख कर उससे अपने सीने से लगाया और फूट फूट कर रोने लगी, दो पल बाद ही फरहान की कब्र आ गयी. अम्मी अपनी औलाद की कफ़न देख कर बेहोश हो गयी, बड़ी मुश्किल से उन्हें होश मे लाया गया, फिर अब्बा और आमिर ने फरहान की कब्र को कन्धा दिया और कब्रिस्तान की ओर चल दिए. आमिर के मुह से अभी तक एक आवाज़ भी नहीं निकली, मानो जिंदा लाश बन गया था वो.
आज पूरे 48 घंटे हो गए हैं आमिर के गले से एक बूँद पानी तक नीचे नहीं गया है, अभी तक एक आवाज़ नहीं निकली है. अम्मी का रो रो कर  बुरा हाल है, अब्बा ने कुछ हिम्मत जुटा रखी है पता नहीं कैसे. शायद ये सोच कर की वो टूट गए तो बाकी लोगों को कोन संभालेगा.
अब तो बस एक ही सवाल है: क्या मासूमियत एक गुनाह है?
उफ़! पता नहीं क्या हो रहा है ये. पता नहीं कब रुकेगा ये, कभी कभी तो ये भी लगता है की रुकेगा भी या नहीं यूँ
मज़हब के नाम पे मासूमों की जान लेना? क्या अब  कोई धर्म इंसानियत से भी ज्यादा बड़ा  हो गया है?
ना जाने और कितनी कब्र  खुदेंगी अब?
ना जाने कितने घरों की ईद और दिवाली पे ग्रहण लगेगा?
ना जाने और क्या क्या होगा!!!!
इंसानियत तुम्हारी बड़ी याद आ रही है आजकल!!!!! :(

Wednesday, 17 December 2014

Humanity: A myth?

It seems that something is wrong with 16th December.  In 2012 it was the brutal gang rape and in 2014 it was the horrific attack in a school in Peshawar. Of course! the date is not to be blamed, it is the dying spirit of humanity that leads to such incidents.
As per various reports 132 children were shot dead and more than 400 student got injured. Sources reveal that this happened in the name of RELIGION. I am quite sure Allah wont be happy seeing those small coffins.  I don't really understand which holy book teaches terrorisim. I was taught to love human race  in school but as I grew up I was unfortunately exposed to all the complications this world had and still has. Honour killings, rape, murders have become normal incidents now. They aren't even the part of the front page of our newspapers. But this does not mean that these things dont exisit. Some people in order to condemn the deeds done by terrorists, rapists etc, compare them with animals. But what i strongly believe is animals are much better than these human beings. Comparing such inhuman human beings with innocent animals is an insult to the animal kingdom. Has anyone ever heard animals fight over religion? have you ever heard of rape cases in animal kingdom? NO! and that is the reason why today animals are more sophisticated and cultured as compared to human beings.
My faith on humanity is shaking or rather trembeling maybe because i know humanity will soon be a myth!


Tuesday, 16 December 2014

Dance: A Crime?

I was at an event in Siri fort auditorium. One of my closest friend was the lead Bharatnatyam dancer in the event and trust me she danced really well. But after the event something really very shocking happened her mother came to the green room where we both were chatting and slapped her. She said " ye sab kya kaand kiya hai tumne", at that point only her dance teacher came and said " madam kya kar rahi hain, isne to jaan daaldi aaj" her mother didn't say anything and held her hand and went away.
Well, I am not shocked with this incident at all, just so use to this crap. I only have one doubt since when did dancing become a KAAND?
Huh! Indian parents and education system are just beyond me. World you are officially hopeless. Absolutely hopeless. 

Monday, 15 December 2014


हर वो चीज़ जो दिल से निकले, हर वो चीज़ जिससे करे बिना हाथ तडपे, हर वो चीज़ जो सुकून दे होती है कला. खैर आजकल तो पैसे में हर चीज़ तोली जाती है आखिर हम एक प्रगतिशील दुनिया का जो हिस्सा हैं, लेकिन अगर कोई भला इंसान इन लोगों को ये समझा दे की कला को इनके पैसों की कभी ज़रुरत नहीं होती, कला को तो इन लोगों तक की ज़रुरत नहीं है, ये तो यही बेबस लोग है जो ज़माने की भागदौड़ से थक हारकर के कला की ओर खिचे चले आते हैं.
थक हार के जब वापस आते हैं घर तो किशोरे दा के गाने सुने की तलब लगती है ना? मन करता है लेकिन स्वीकार करना भी तो शान के खिलाफ है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब कह कह कर हार गए " ज़माने की दौड़ मैं इतना न खो जाओ की आत्मा को सुकून देने वाले संगीत का भी ख्याल न हो" .
लोग इतने व्यस्त होगये हैं अब की नृत्य और नाच मे फरक तक भूल गए हैं. नृत्य वो होता है जिसमे ताल की मात्राओं और थाप की लय का ख्याल रखा जाता है, और नाच वो होता है जो बस शारीर को ख़ुशी से हिलाने पर किया जाता है. पते की बात इसमें ये है की ये दोनों चीज़ें एक हो कर भी कितनी अलग है, और इन दोनों की ही अपनी एहमियत है. और ये दोनों ही कला हैं.
मैं शायद अपने विचार कला के प्रति कभी भी शब्दों मे अभिव्यक्त ना कर पाऊं  क्यूंकि मेरे लिए 
कला इश्क है कला सांसों का वजूद है कला जीने का मकसद है!!!!!!

Sunday, 14 December 2014


इंसान अक्सर दिमाग को शांत करने के लिए नशा करता है. पर फिर भी लोग कहते हैं नशा नाश करता है. शायद  करता हो भी. मुझे इस विषय मैं अधिक जानकारी नहीं है. या फिर यु समझ लीजिये की अभी इस पर अपनी टिपण्णी देने योग्य नहीं हुई हूँ.
हो सकता है बिड्डी, शराब इन चीज़ों का नशा बुरा हो. पर मुझे इनका नशा करने की आदत नहीं है. मुझे तो सुर,ताल,रंगो और मुस्कानों का नशा है. ये एक ऐसा नशा है जिससे दिमाग शांत और मन को को सुकून मिलता है. एक अजीब सी शांति का आभास होता है. चंद पलों के लिए ही सही, दुनिया बहुत ही खूबसूरत लगती है. ऐसा लगता है हर पल कितना प्यारा है.
अब आप ही बताये जो आजकल के ज़ालिम ज़माने मैं मई हृदय को सुकून और चैन की एहसास दिलाये उससे छोड़ना उचित होगा क्या? नहीं ना! इसीलिए नाचिये, गाइए, रंगों के सोंदर्य मई खोइए मुस्कुराइए और लोगो के मुस्कुराने की वजह बनिये.
क्या पता इस बहाने आप ज़िन्दगी से रुबरो हो जाएँ!!! :) :D

Saturday, 13 December 2014

ज़िन्दगी तो बस हौंसलों की उड़ान है!

ज़िन्दगी तो बस हौंसलों की उड़ान है
सपनों पर गुमान है
अपनी बनानी पहचान है
जज्बातों पर अभिमान है
अपनों की बढानी शान है
दोस्तों में बसी जान है
वक़्त बड़ा शैतान है
और ये सब मिलकर बने ज़माने का स्वाभिमान हैं!!!!!

Friday, 12 December 2014

Reservations: yes OR no?

Reservation in India is the process of setting aside a certain percentage of seats (vacancies) in government institutions for members of backward and under-represented communities (defined primarily by caste and tribe). Reservation is a form of quota-based affirmative action. It is governed by constitutional laws, statutory laws, and local rules and regulations. Scheduled Castes (SC), Scheduled Tribes (ST) and Other Backward Classes (OBC) are the primary beneficiaries of the reservation policies under the Constitution- with the object of ensuring a "level" playing field.s
I am not really very against this concept but it's missuse disturbs me a lot. These days i believe reservation is given priority over merit and this ABSOLUTELY UNFAIR. Reservation to an extent is alright but beyond that it becomes harmful in both ways sociallly and economically. A particular sect of our society has stopped working just because they know that their is something called reservation which is going to save them no matter what, while the other half of the society works day in and day out even after knowing the fact that may or may not get an opportunity to even show that they are capable of something.
I think or rather firmly believe that it's time to ammend this provision. If not scrap this policy we must reduce the percentage of it for sure. Otherwise, merit shall soon die.

Think, Speak, Act!!! :D :)

Thursday, 11 December 2014


 दुनिया  के बुरे दिन तो तब से चले आ रहे हैं जब से एक भाई दूसरे भाई का क़त्ल  सिर्फ कुछ करोड़ रुपयों क लिए कर रहा है, लोग 5 साल की मासूम बच्चियों के बलात्कार कर रहे हैं, बुज़र्गों को कुत्तों से बदतर तरीके की ज़िन्दगी गुज़ारने पर विवश किया जा रहा है और न जाने क्या क्या होता चला आ  रहा है इस प्रगतिशील संसार मैं.  मुझे लगता था की ये बुराई  की चरम सीमा होगी लेकिन मैं गलत थी.
लोग तो अब धर्म के नाम पे भी युद्ध करते हैं. मंदिर मस्जिद बनाने के चक्कर मैं ही न जाने कितनी हज़ार जाने चली जाती हैं, न जाने कितने बच्चे अनाथ हो जाते हैं, न जाने कितने लोगों और परिवारों की खुशियों पर ग्रहण लग जाता है. वैसे तो मैं अपने आप को नास्तिक मानती हूँ लेकिन इतनी तो समझ मुझे भी है की अल्लाह ओर राम अलग नहीं हैं. माँ हो या अम्मी, पापा हो या अब्बा, दीदी हो या आपी, मौसी हो या खाला होता तो सब एक ही है.  हम गुलज़ार और  बच्चन दोनों की कवितायेँ पढ़ते हैं, रफ़ी साहब और किशोर दा के गाने सुनते हैं, और तो और हलवा हो या सिवयीं दोनों ही चाव से खाते हैं तो भला हिन्दू मुसलमान मैं फर्क क्यूँ करें?
ईद हो या दिवाली मकसद तो सिर्फ लोगों को जोड़ना ही होता है, प्रार्थना हो या दुआ की तो दोनो ही अपने और अपनों की भलाई के लिए जाती है, तो फिर आखिर क्या फर्क पड़ता है की मेरा नाम शर्मा हो या खान?
अर्थी उठे या कब्र खुदे, शोक मने या दुःख हो, अश्क बहे या आंसू, दर्द हो या पीड़ा क्या अब  इनमें भी कोई फरक होता है?
अरे भले लोगों! चाहे सुख की घडी हो या दुखों का बादल छा गया, मुसीबत और समस्या भी इतना भेद भाव नहीं करती जितना हम लोगों ने आपस मैं करना शुरू कर दिया है.
चाहे कोई भी धर्म हो पढ़ाती तो इंसानियत और मानवता का पाठ ही है.
प्यार और मोहोबत दोनों ही बाटने से बढती है दोस्तों! :D

Wednesday, 10 December 2014


जो लोग कहते हैं आजकल भलाई का ज़माना नहीं है.  वो लोग उस प्रजाति के होते हैं जिन्होंने शायद काफी समय से दर्पण नहीं देखा होता है. अब आप सोचते होंगे की मैं भला ऐसा क्यूँ कह रही हूँ. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि भलाई कोई मिठाई तो है नहीं जो खाने से ये या बाटने से कम हो जाये, तो फिर ये भली भलाई आखिर कम या ख़तम आखिर हो कैसे रही है?
मैंने काफी दिनों तक इस विषय पर विचार किया फिर कहीं जा कर ये समझ आया की भलाई नहीं भले लोगों का अकाल पड़ गया है इस दुनिया मैं. आजकल लोग रूपया, पैसा, घर, गाडी, बंगला, जयादात को एकत्रित करने मैं इतने व्यस्त हो गए हैं की अपने अपनों के लिए ही समय नहीं निकाल प् रहे हैं, औरों की तो कोई क्या ही बात करे. बड़ा अफ़सोस हुआ मुझे ये जान कर की आजकल दोस्ती-यारी तो मानो बोझ ही बन गयी है हम लोगों पर.
कल-परसों एक बुज़ुर्ग आदमी से मेरी बस युहीं राह चलते बात हो रही थी, बातों ही बातों मैं उन्हों ने कहा " अर्थी को कन्धा देने ये दौलत नहीं बल्कि चार आदमी ही आयेंगे" ये बात सुनकर मेरे मानो कान ही खड़े हो गए, पर दो पल बाद जब मैंने ये बात सोची तो मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत  हो गयी.
काश ये दुनिया पैसे के आगे कुछ सोच पाती तो वाकई बहुत खूबसूरत होती, तब शायद इस भलाई की इतनी कमी भी महसूस ना होती
लेकिन फिर भी उम्मीद पे दुनिया कायम है, तो फिर भलाई को मारा हुआ घूषित करना भी उचित नहीं होगा, इसलिए अगर  हो सके तो कभी अमीर इंसान बनने की दौड़ से फुर्सत मिलने  पर एक बार दर्पण ज़रूर देख लिजियेगा अपने अन्दर की भलाई से ज़रूर वाकिफ हो जायेंगे!

Tuesday, 9 December 2014


100 people killed in Gaza, few rapes in Delhi, some scams of 1000 crores, woman killed for dowry, girls below 5 years of age are raped because apparently they were wearing inappropriate clothes (i.e. frocks), homosexuals harassed everyday, USA doing almost anything and everything to make this world a capitalist economy and the list can go and on.
Law and order, police, international organisations etc. Ah! i think these are absolutely dead or rather absolutely in active or whatever it is.
Am i getting used to all this??
NO NO NO! I just cannot/ should not be OKAY with all this. I should go mad/sleepless/ at least i should get affected as I used to get earlier.


Sunday, 7 December 2014

Thank You! :D

In the past 48 hours I have recieved two formal awards and a book with a note and an autograph which was gifted by a very special professor in college. Somehow I am happier because of that book of exactly 229 pages [including preface, acknowledgements etc] more than those awards.
At times doing things that you really love to do and you know that you have that one person who likes what you love doing is much more satisfying working for medals, CV and certificates!

Passion, Work, Life!!! :D :)

Saturday, 6 December 2014

छोटी सी ज़िन्दगी!

लोग कहते हैं ज़िन्दगी बड़ी लम्बी और हसीन होती है, पर मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है की ज़िन्दगी बहुत छोटी होती है.
हाँ! छोटी.
बहुत छोटी है
 इसीलिए अश्क बहा कर इसे व्यर्थ न करें मुस्करिये और दूसरों के मुस्कुराने की वजह बनिए
इसीलिए हर उस चीज़ का तजुर्बा कीजिये जिसका आप करना चाहते हैं, क्यूंकि क्या पता कल हो न हो
इसीलिए लोगों मैं इतना प्यार बाटीये की हर पल, हर सांस उन्हें अपनेपन का एहसास हो
इसलिए खूब  सारे खूबसूरत सपने देखिये और उन्हें पूरा करने का आनंद उठाइए
इसीलिए बंदिश की घुटन से बहार आ कर आज़ादी की हवा में सांस लीजिये
सच मैं ज़िदगी बहुत ही छोटी है शोक मनाने के लिए इसलिए जी लीजिये अपनी छोटी सी ज़िन्दगी!

Friday, 5 December 2014

Dilemma! :p

Supposedly the Earth rotates around the sun. But the sun is also flying a 100 million miles per hour through the Milky way galaxy. But wait the Milky way galaxy is also rotating around a single universe. And then THAT universe is also rotating with other universes.
And with so many rotations happening around me people expect me to stand still. How is that even possible???

Confused, Confused, Confused!!!!!

Wednesday, 3 December 2014

Life: A Canvas!

They say life is a journey, well I say life is a canvas. A blank canvas and nothing else. I don't know why but these days I have started seeing colours as the most innocent form of expression. I don't even know whether this is a good thing or a bad thing. At times I think this because people have become so busy that sitting together seems to be a burden on them.
Whereas colours on the other hand just aptly depict every emotion and feeling. 
So, yes. Paint this canvas called LIFE very beautifully. The best part of painting this canvas is that you don't need to be an artist, you don't have to use complicated techniques for painting this gorgeous master piece. All one needs is a base of love and hugs,a pinch of optimism, a handful of friends, sacks full of dreams and most importantly truck loads of courage to live life! 

Paint, live, dream!!! :D

Tuesday, 2 December 2014


I am not a language student technically,  but I love exploring new languages everyday.  I feel languages themselves have their own sweet world. Each language has it's own beauty. For example: punjabi automatically creates a very lively mood whereas Urdu is a very composed language very soft and mild language.  Each language has it's own beauty and nature.
But what I feel these days is accent is given more importance than the actual language. For some it is a status symbol, like speaking Hindi or any other language in British or American accent seems to be the new cool. One must realise every language or for that matter even dialects have their own identity. Love the language the way it is because nobody enjoys when someone fiddles with their identity.
The moment you think or start believing in the identity and the fragrance of every language you will be exposed to a whole new world. Where the only aim is to keep the spirit and the love for word alive. That moment will be one of the finest moment you will ever experience.

Live,  love and read! :D

Sunday, 30 November 2014

Life is music!

I have heard people say "Music is my life, but what I believe is life is musical.
Every day brings new light which is more like a new happy song,  every emotion expresses something thus emotions are lyrics, my mood decides the tune of the song whether it'll be rock, jazz etc and the events that happen during the day become the accompanying instruments.
soul is the music director and we as individuals are singers!
And that is how I justify my life is music. :D
Sing, dance and smile! :D :)

Saturday, 29 November 2014

Hugs bring smiles!

I was sitting in the lobby like any other day, when my phone rang. It was a call from an unknown number. Nonetheless, i recieved the call. It was a call from my friend. She had called up from a near by PCO. All she said to me during our 30 second conversation was meet me in the park in the next 5 minutes. Before I could ask her something she disconnected the line. 
I rushed to the park as i was really worried about her. I reached before she was there. I waited for a minute or two when I saw her coming running towards me with tears in her eyes. She hugged me tight and cried, cried her heart out for about 15 minutes. 
After that i wiped her tears put my hand on her shoulder and asked her what had happened, she told me the whole story. The situation was such that even i didn't have a solution to the problem. Nevertheless, i tried to lighten her mood, but alas no success. I didn't know what to do so i gave her a big bear hug and to my surprise the moment i gave her a warm hug she was smiling, her forehead didn't have evil lines of tension now. It was pretty visible that she felt better after the hug.
We sat on the only vacant bench in the park had a chit-chat session, until she felt relaxed. After the chat session we decided to go home togethere. I decided to drop her home first. We walked to her house with another session of jokes and crazy talks. When we reached her house she gave me a warm hug and said I feel calm now, to which I smiled. As i turned to go back she held my hand from behind and said " promise, you will never ever ditch me or leave me" and I with full confidence said I PROMISE! and I smiled again left the place.
While i was coming back home, a flashback of the series of event that had happened  ran through my head and made me realise 2 things:
1) At times all a person craves for is a friend to sit by her side and say no matter what i am always there.
2) Hugs can make all the difference.
So, ladies and gentelmen try spending time with your near and dear ones., You never know the turmoil going inside that person and the amount of craving she has for a person to sit by and say ALL IS WELL!

Keep spreading smiles and love! :D

Friday, 28 November 2014

गुलामी: कला की!

लोग कहते हैं वक़्त किसी का मोहताज नहीं होता. मैं कहती हूँ कला के अलावा मैं किसी और चीज़ की मोहताज नहीं हूँ. हाँ! ये सच है की मे वक़्त बरबाद करती हूँ , कभी कभी कुछ ज्यादा ही. पर मैं ये बात कभी नहीं मानूंगी की मैं वक़्त की गुलाम हूँ. ऐसा नहीं है की मैं कोई नायाब इंसान हूँ, बस फरक इतना है की लोग वक़्त की और मैं कला की गुलामी करती हूँ.
किसी ज़माने मैं वक़्त की भी दिन-रात सेवा करा करती थी पर उससे सिर्फ मुझे थकान महसूस होती थी. हर चीज़ के लिए मैंने अपना वक़्त निर्धारित कर रखा था. लग रहा थी की ज़िन्दगी किसी घडी की तरह हो, जो चलती तो है पर उसका कोई वजूद नहीं है. ऐसा लगता था की बस सांस ले रही हूँ क्यूंकि वो ज़रूरी है, जी रही हूँ बस पर जिंदा नहीं हूँ. एक दिन इस वक़्त की गुलामी से तंग आकर मैंने इस ज़ालिम वक़्त को लात मारी और वो करना प्रारंभ किया को मुझे पसंद आता था.
धीरे-धीरे मैंने जब वक़्त की गुलामी छोड़ अपने दिल की बात को सुन्ना शुरू किया तब मुझे ये एह्स्सास हुआ की ये ज़िन्दगी कितनी हस्सीन, और हर लम्हा कितना ख़ास होता है. एक महत्वपूर्ण बात की आखिर कला क्या चीज़ होती है? नाचना?, गाना? बजाना? आदि. सही म्य्नों मे इसकी परिभाषा तो शायद ही कोई बता पाए पर मेरे लिए कला हर वो चीज़ है जिसे करने के बाद आपका दिमाग शांत और आत्मा को सुकून का आभास हो. हर वो चीज़ जो आपको दुनिया के शोर शराबे से दूर, इस कभी न ख़तम होने वाली दौड़ से अलग ले जाये वो कला होती है. ये एक ऐसी गुलामी है जिसके बाद आपके अन्दर जीवन को जीने का जोश आ जाता है. हर सांस खूबसूरत लगने लगती है
गुलामी करनी है तो उस चीज़ की करिए जो आपकी मुस्कान का कारण बने.
अपने सपनों की गुलामी करिए, अपने हर शौक की गुलामी करिए, अपने अपनों की मुस्कान की गुलामी करिए.
इस  कला की गुलामी को जो अपने जीवन का मकसद बना ले मेरे अनुसार उससे ज्यादा सुखी इंसान कोई हो ही नहीं सकता.

I Write

I write
I dont know whether i write nicely
I dont even know whether people like what I write
all I know is that when I write I feel relieved
I feel as if my chest is clear and my mind is without fear
and that is how I justify that I write.

Thursday, 27 November 2014


I hate this device not because I don't like getting clicked,  but simply because it captures moments of happiness.  Every picture says more than 10000 words. Uncountable emotions are captured,  every smile this commodity captures becomes a memory.
But,  my major problem is that people these days instead of living the moment focus on capturing the moment.
Recently,  I went to a dance event where children hardly 9-10 years old were dancing. As soon as the performance started almost every parent in the hall took out their phones,  cameras and what not and started recording the performance instead of enjoying it Live.
I am not saying one shouldn't click pictures all I'm trying to convey is that living the moment is much more important than capturing the moment.
So, live, dream and smile for yourself,  smell the fragrance of that happy moment and trust me your brain will capture the moment more beautifully than any DSLR  camera!

Monday, 24 November 2014

Few hours before exam!

So my 3rd semester exams start today. Am I nervous? well....I don't know. Am I prepared? I think I am. I usually am pretty cool before exams but I don't know why I am a bit nervous this time. Technically I should be studying instead of blogging but then I have a saturation point and I have attained that tonight so my blogging is kinda justified.
Also, I am listening to my favourite song on repeat only mode for some unknown reason.
And the coolest part is that it is okay to be a bit not so okay few hours before your exam.
wish me luck!  :D


अपने सपनों की चिता को अपने आप आग लगाने से ज्यादा दर्दनाक शायद ही कुछ और हो इस दुनिया मैं. मुझे हमेशा लगता था की रो लेने से मन हल्का हो जाता है और सारा दर्द बहार आकर ख़तम हो जाता है. लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं. ये न जाने कैसी तकलीफ थी रोना ही नहीं आया, बस अजीब सी घुटन होती रही. एक अजीब सी बेचैनी सी हो रही थी, ऐसा लग रहा था की शायद ये दुनिया एक अभिशाप है. मुझे नहीं पता ऐसा कितने लोगो के साथ होता है, मुझे ये भी नहीं पता की लोग इससे कैसे बहार आते हैं, मुझे तो ये भी नहीं पता की बहार भी आते हैं या नहीं क्यूंकि मैं तो इस घुटन से अभी तक अपना पीछा नहीं छुड़ा पायी हूँ.
न जाने ये कैसी अजीब सी बेबसी है. ये एक ऐसी स्तिथि है जिसे शायद ही कोई शब्दों मैं बयां कर पाए.  कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आंसू भी हस रहे हों, ऐसा प्रतीत होता है की अपनी खुद की आत्मा ही धिकार रही हो. अपनी ही आँखों मैं अपने ही अपनों के लिए अजीब सी नफरत दिखाई देने लगती है. पर एक बात तो मानननी ही पड़ेगी और वो ये है की इस हालत के जिमेदार कहीं न कहीं हमारे अपने ही होते हैं. मैं तो कई बार अपने आपको सहानुभूती देने के लिए ऐसा मान ही लेती हूँ, क्यूंकि मेरा मानना ये भी है की अपने आप से नफरत करने से लाख गुना बेहतर है अपनों से नफरत करना. लेकिन ये तरकीब भी कभी कभार ही काम आती है.
बड़े- बुजुर्गों ने कहा है "अपने आखिर अपने ही होते हैं" और चाहे मैं अपने आपको कुछ भी सम्झालूँ इस सचाई को कोई नहीं बदल सकता. हाँ! ये सच है उन्होंने मेरे ख्वाबों को एहमियत नहीं दी, काफी हद्द तक ये भी सच है की उन्होंने ने ही मेरे अन्दर के खिलखिलाते इंसान को मारा है, और तो और ये भी सच है की आज उन्हीं की और सिर्फ उन्हीं लोगों के कारण मुझे अपने आप घिन आती है.
अपना ध्यान इस दिशा से हटाने के लिए मैंने काफी कुछ किया, जैसे: लगभग सारी प्रतियोगिताओं मे हिस्सा लिया, घर से बाहर रहने के जायस कारण ढूंढे जैसे मुझे कम से कम समय बिताना पड़े उन चार दीवारी के भीतर. कई बार अपने आस पास की चीज़ों की आवाज़ इतनी ऊँची करी की अपने अन्दर की आवाज़ सुनाई ही न दे पर ये तरकीब भी कुछ समय बाद असफल हो गयी.
कभी कभी बस ऐसा लगता है की रो लेते तो शायद अच्छा होता.
बस एक ही आग्रह है आप सबसे की अपने ख्वाबों की कब्र मत खोदियेगा कभी जीते जी मर जायेंगे!

Sunday, 23 November 2014

Delhi roads: A mood lifter!

Walking alone at night with some pleasant music on. When it seems the street lights are focused on you, stars above smile at you, moon tries to calm you down, mild winds dismiss the lines of tension on your forehead and the sky above enjoys the whole scenario.
The best all of is that they accompany you till the end. How I wish the time would stop. And this pleasure could last forever!
I feel peaceful now very peaceful and I am smiling just because of this.
This might sound strange but then experiencing is believing! :)

Friday, 21 November 2014


Some call it a cowardly act, others call it stupidity. At times the world thinks people who attempt or try to commit suicide are either escapists or losers in life. At times I wonder have these human units ever thought why does a person think about something called SUICIDE! It is  pretty obvious nobody likes to hurt themselves. Right? I think human units these days are way more than too busy to lend an ear to listen to other person's problem and that is exactly the reason why I call such people human UNITS and not not human BEINGS. I am not in favour of suicides. I am against it too. But that is not the solution.
In this rat race to come first, the skill and the ability to not tolerate the second position has made us so insensitive that we have forgotten basic lessons of humanity. Maybe that's what we call development unfortunately. One might help a friend or a relative monetarily but lending a shoulder to cry on seems to be a herculean task. I am not saying that one shouldn't help in terms of finances. All I am trying to convey is at times we all need something beyond materialistic pleasures like a hug from a person we love, a kiss from a person who is concerned about us or at times just a shoulder to cry on. Yes! at times we all need that. You need it, I need it, in short all of us need/require it at some point in time. 
I don't know all the reasons behind suicide. But one of the most common and prominent reason why teenagers and youngsters commit suicide is due to PRESSURE FOR MARKS and  PRESSURE FOR A GOOD CAREER. Now what I fail  to understand is, since when did marks and career become more important than one's life? Have we reached that level where the potential of an individual is measured in terms of marks or his/her pay scale?  I myself am a victim of this absolutely ridiculous Indian Education system and an abnormally weird Indian society too. But i choose to fight back instead of giving up!

So just remember SUCIDE is not a cowardly act it is a way of showing pain and suffering. Best way to help a suicidal person is to spend time with them. Talk to them, party with them make them believe that you are there no matter what. And most importantly give them a hug. Trust me it is the best thing possible, best form of expression, best way to tell you are always there!

Spread Love folks! :)

Worth of a hug!

One day I was really upset for some reason. I was sitting on the staircase of my college with my arms folded, back straight and legs crossed. Everything was usual in the corridor. Then suddenly a professor came taped my head and said come let's go for a walk. I didn't know her very well she had never taught me we had just met during an event and that too for a very short period of time. Nevertheless, I accompanied her for a walk. We went outside the college without uttering a single word. When we were at least 200 meters away from college she said, "Hi" and I replied the same. After about 2 mins later she asked me at times it's just okay to cry instead of feeling suffocated within. The very next moment i hugged her tight, really tight and cried, cried a lot. After crying for a good 10 mins she wiped my tears gave me a smile and said are you feeling better now? to which i nodded. Then she kept her hand on my head and said always remember one thing in life " At times all you have to do is let your emotions flow and a shoulder to cry on", I didn't say anything after that. We continued walking for a while. After a while I asked her, Ma’am! you didn't ask me what happened, to which she replied " I wanted you to share on your own when you felt better", I smiled and after a while told her everything. I gave her a detailed account of what had happened each and every possible detail. She listened to the whole story very patiently and then gave me a simple solution for the same.
I was feeling much better now or rather I felt relieved.  By, this time we had reached the parking lot where her car was parked. She was just about to sit in her car when I said thank you, she looked back smiled and hugged me again. We exchanged our contact numbers, she told me to whatsap her once I reached home and then she left.
I walked towards the metro station while thinking about the sequence of events that had happened in the last one hour, I couldn’t really understand why did all this happen, how did it happen and the usual set of primary questions flooded my head.
All I now knew was at times all you need is GOOD TIGHT HUG and A SHOULDER TO CRY ON!

Hence never underestimate the power of hug! J


हर पल का एहसास है
हर क्षण का आभास है
हर वक़्त का ख्याल है
पर फिर भी हर जगह समय का आकाल है!

जीवन की कहानी!

हर घडी कुछ बताती है
हर चीज़ कुछ सिखाती है

हर पल कुछ होता है
इंसान यूँ ही सपने संजोता है

हर अश्क कुछ समझाता है
हर लम्हा कुछ सिखा जाता है

हर उम्मीद कुछ जताती है
हर आस कुछ याद दिलाती है

हर नींद सुकून लाती है
हर सुबह उम्मीद जगाती है

हर रोज़ एक मौका है
हर क्षण एक धोखा है

हर सुबह नयी है
और हर रात पुरानी है

बस यही जीवन की कहानी है!


हर रंग कुछ कहता है
हर सुर कुछ बोलता है
हर ताल कुछ कहती है
हर लय कुछ सिखाती है
हर साज कुछ समझाता है
हर मुस्कान कुछ बताती है
हर खवाब कुछ बोता है
हर रंग कुछ कहता है
हर सुर कुछ बोलता है

Thursday, 20 November 2014


दर्द के बिना मलहम की एहमियत कहाँ
नफरत के बिना प्यार की ज़रुरत कहाँ
बंदिश के बिना आज़ादी की कीमत कहाँ
बेबसी के बिना उम्मीद की आवश्यकता कहाँ
और अश्कों के बिना मुस्कराहट की वक़त कहाँ!!!

Wednesday, 19 November 2014

वाह रे शुभचिंतकों!

भाई ये शुभचिंतक भी अजीब लोग होते हैं. ये लोग कहते हैं की हम हमेशा अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं. लेकिन फिर भी अपने ही बच्चों के सपनों का गला दबा देते हैं. कोई मुझे ये बताये आखिर इसमें ये आदरणीय शुभचिंतक कोनसा भला ढूंड रहे थे? एक तो जो करना था वो करने भी न दिया ऊपर से भलाई और प्यार का कम्बल ओढ़ कर आराम से सो गए.
अब कोई इनसे ये पूछे की ये तो चैन की नींद सो गए पर जिस इंसान के साथ ये ज्याख्ती की है इन ज्ञानी शुभचिंतकों ने उस बेचारे की तो रातों की नींद ओर दिन का चैन ही उड़ गया ना. आजकल एक नया चलन चला है उसको लोग emotional blackmail कहते हैं. इस भारी शब्द के तहत इंसान को अपने परम पुज्य शुभचिंतकों की बात माननी पड़ती है क्यूंकि वो उनके बड़े हैं, उनसे बेंतिहान मोहोबत करते हैं ओर सबसे एहम बात उन्होंने ये ज़ालिम दुनिया हमसे ज्यादा देखि होती है. 
मैं ये बिलकुल भी नहीं कह रही हूँ की वो गलत हैं. मैं बस ये बताना चाह रही हूँ की जब तक गिरेंगे नहीं, लड्खादायेंगे नहीं तब तक चलना कैसे सीखेंगे? ये लोग हमे चलना सिखाने के बजाये हमे बैसाखी इस्तेमाल करना पहले सिखा रहे हैं जो की गलत है बिलकुल गलत है. 
जो सपने हम देखते हैं उन्हें पूरा करने मैं हमे ख़ुशी के साथ साथ सुकून भी मिलता है. पर जो सपने हमे ज़बरदस्ती हमारे शुभचिंतक दिखाते हैं उन्हें पूरा करते-करते तो हम ही आधे हो जाते हैं.
अब आप खुद ही सोचिये कोनसा विकल्प उचित है और कोनसा अनुचित है. मेरे अनुसार तो नतीजा साफ़ है. 
बाकी जैसी आपकी इच्छा!
जो भी करिये बस खुश और सुकून से रहिये!!! :)

Tuesday, 18 November 2014

Serenity is Triveni!

Triveni Kala Sangam, a place where I realised the importance and value of peace. This place is technically a school for music,  art, dance, photography and sculpture.Three rooms in this amazing place are reserved for art exhibitions excluding one open art gallery.
I joined this school to continue learning the love of my life i.e. TABLA. Initially I used to go straight to the class room and learn the days lesson and leave the premises as soon as my class got over.
One day I was in a bad mood,  so I decided to go to Triveni 2 hours before my class started. In order to deviate my mind went inside the art gallery and to my surprise the moment I entered the gallery my face had a broad grin. I saw each and every painting in the gallery with utmost concentration, I spent good 10 mins looking at one painting. That day I realised the value of expression. I realised colours could express more than words. And every painting has a story behind it and every artist meditates while painting.
After I left the art gallery I decided to spend somethime in the Open Art Gallery. I just sat in the gallery for 1 hour and my mind was at peace. My mood was calm now. I didn't know what led to this change but I loved that peace within me. So, I decided to go before time the next day also sat in the open art gallery clicked pictures of the sky, trees, walls and almost everything. For a person like me who hated photography this was a drastic change. I clicked around 25-30 pictures. Whenever I looked at the sky above I found it beautiful,  for birds their chirps became music to my ears and for the smell of paints the finest fragrance on Earth.
Oh yeah!  Not to forget the amazing canteen where I religiously have an ice cream and a Fanta. The staff knows me well now and doesn't even ask for my order now, they just give me what I want and on my part I don't even ask for the bill and straight away put forty rupees on the table. One fine day the cashier asked me "madam aap 3 din se aaye nahi sab theek hai na? " I was surprised by this question I never knew a cashier would be so concerned. Nevertheless,  I replied and said "haan dada sab theek hai, chinta mat kariye". To which he smiled. I later realised I had started loving that place so much that everyone part of that place became an essential part of my life.
Every room in Triveni became my room whether it was dance room, flute room, music room or the canteen.  I felt those rooms waited for me, this might sound weird but that's exactly what I feel. I never knew Triveni would become my best companion.
The rooms, people, staff, paintings or I can simply say I love Triveni the way it is.
Triveni is the only school which taught me what exactly is meant by serenity, peace and selfless love.

सपने: अपने या अपनों के???

लोग कहते हैं फलाना बीमारी सबसे खतरनाक है, फलाना आदत बहुत खतरनाक है और भी ना जाने क्या-क्या कहते हैं लोग. पर मुझे लगता है और पाश ने जो कहा है “सबसे खतरनाक होते है हमारे सपनों का मर जाना”. ये एक ऐसी मृत्यु होती है जिसका गम सिर्फ हम और हमारी अंतरात्मा ही मेह्स्सोस कर सकते हैं. सपनों की मृत्यु के बाद एक अजीब सी घुटन और एक अजीब सी बेबसी का आभास होता है. मैंने बहुत कोशिश करी की लोगों को अपने सपनों का गला दबाने की श्रेय न दूँ पर ऐसा होना सका.
कुछ अपनों  के समक्ष जब मैंने ये बातें करी तो उन्हें लगा की ये किसी बुरी संगत का असर है. कैसे बताती उन्हें की ये सब उन्ही के लिए हुए फैसलों का परिणाम है? शायद जो लोग जिन को मैं दोष दे रही हूँ वो मेरे अपने ही हैं. इन्ही अपनों ने मेरे खवाबों की, मेरे कीमती सपनों की हत्या की है. क्या मेरे अपने ही मेरे खवाबों के गुनेहगार हैं? या मैं अब इतनी कमज़ोर हो गयी हूँ की मैं अपनी इस हालत का जिमेदार किसी और को ठेरा रही हूँ?  
बेराल जो भी हो धरती पर पुरे 18 साल बिताने के बाद ये तो पता चल गया की अगर कोई चीज़ है जो सबसे खतरनाक, सबसे ज्यादा दर्द पहुचने की शमता रखती है वो है हमारे अपने अनमोल कीमती सपनों की मृत्यु!
मैं पूरे संसार मे रहने वाले हर एक इंसान से बस एक ही आगरेह करना चाहती हूँ की चाहे कुछ भी हो जाये अपने सपनों को मरने मत दीजियेगा. क्यूंकि इस ज़ख़्म को भरने के लिए कोई दावा नहीं है और ये एक ऐसा घाव जो वक़्त के साथ और गहरा ही होता है.
सपने देखिये और उन्हें पूरा कीजिये!!! :)


कुछ सही तो कुछ ख़राब कहते हैं,
लोग तो हमे बिगड़ा हुआ नवाब कहते हैं,
हम तो बदनाम भी कुछ इस कदर हुए हैं,
की पानी भी पियें तो लोग शराब कहते हैं!!!

Monday, 17 November 2014


29th september 2012! was a black day in my life, because i lost you, i lost you forever. For a month i couldn't sleep, eat or do almost anything but as promised didn't cry. I swear not even a single drop of tear came rolling down my eyes, maybe because i was your strong grand- daughter. Chachu often says you are still with us, you are watching us, smiling at us but i don't believe him because you taught me "seeing is believing". Some people say you are gone but I don't believe them either because i know you can never ever leave me alone. You knew i needed you badly before boards then why did you ditch me? why did you break your promise? you were suppose to wish me luck before each and ever exam, you were suppose to see me shine, then why did you leave me???
I know you know that i miss you everyday, each and everyday but then that's all i can do. I never knew I could be so helpless in life before you left me.
One very simple question that i keep on asking myself is, :"was I bad girl who didn't deserve your company when she needed the most?" Had you been here i would have been a different person, i would be a happy person, i would have loved life, but you still left me.
I don't believe that someone called GOD had the audacity or the courage to snatch you away from me. I know he/she is scared of both of us.
 I have suddenly lost my voice in this house, I don't have a right to express my opinion anymore. I know you are watching, but that is not enough because you must do something. YOU MUST
BABA why did you do that?