Sunday, 8 May 2016

मेरी जन्नत भी तुम और मन्नत भी!

सुना है
कि माँ एक होती है
मेरी तो एक से ज्यादा हैं
तुम सोच रहे होगे
कि ऐसा कैसे ?
मैं बताऊँ कैसे ?

मेरी माँ तो मेरी माँ
है ही
लेकिन उसके अलावा तुम हो
जो मुझसे शायद मेरी माँ जितना
या उनसे भी ज्यादा प्यार करती है

जब मैं तुम्हारे पास आती हूँ
ऐसा लगता है की सब ठीक है
डर और चिंता भी मानो
तुमसे घबरा कर भाग गए हैं

जब मुझे नींद नहीं आती
तब तुम्हारी गोद मुझे सबसे
पहले याद आती

गलत कहते हैं वो लोग
जो जन्नत माँ के पैरों में
ढूँढ़ते हैं
मेरी जन्नत और मन्नत तो
तुम्हारी मुस्कान है
वो मुस्कान जो
मुझे देख कर और भी
'खिल जाती है

जब तुम पास होती हो
तब एहसास नहीं होता तुम्हारी ज़रुरत का
जब नहीं होती हो
तब तुम्हारे बिना
मेरा कुछ नहीं होता

तुम वो हो जो
मेरी ज़रुरत का
मुझसे ज्यादा ख़याल
रखती हो
और ये लोग कहते हैं
कि तुम मेरी माँ नहीं लगती हो

शायद ,
तुम मेरी माँ नहीं हो
पर माँ से कम कभी
हो भी नहीं सकती हो |

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