Sunday, 7 August 2016

आज फिर नींद नहीं आयी!

आज फिर नींद नहीं आयी
वही पुराना इंतज़ार
और कुछ बिखरी हुई
उम्मीदों ने फिर
चुरा ली मेरी
रात की नींद

खैर,
तुम्हे क्या फरक पड़ता है
तुमको कौनसी चिंता है
जो तुम सोचोगे
मेरी सलामती के
बारे में

शायद,
आजकल के ज़माने में
सिर्फ अपने बारे में
सोचने वाले लोग ही
खुश रहते है'

ऐसा लगता है
की अब अपनों
के बारे में
सोचना ही नाजायास
सा हो गया है

और,
मैं तो अब
तुम्हारे अपनों में
भी नहीं आती हूँ
तो, मेरे जीने
या मरने से
तुम्हे भला क्यूँ
फरक पड़ेगा

चलो, कोई बात नहीं
वक़्त के साथ
सब बदल जाता है
तो, ये रिश्ते भला
क्यूँ पीछे रहें?

ये रिश्ते भी
बड़ी बेहरहमी से
या, तो बदल जाते है
या फिर टूट  कर
ज़ख्म कर डालते हैं

हम तो आज भी
तुम्हारी यादों
के टुकड़ों के
सहारे जीते हैं
और
तुम, उन अनमोल लम्हों
को भुला कर
कहीं दूर
शायद,
चैन से रहते हो

ठीक है,
आज नहीं तो कल
ये यादें भी
पुरानी हो जायेंगी

मिट तो नहीं  पाएंगी
पर धुंदली तो हो ही
जाएंगी

जब ऐसा होगा
तब,
मै भी बदल जाउंगी
हो सकता है
थोडा सा जल
भी जाऊं,
लेकिन,
तुम्हारी इन यादों
के सैलाब
और
सलामत हो या नहीं
वाली बेचैनी के
समुन्दर को
तो पार कर
ही जाउंगी.

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